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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 62
तं विस्मितं धेनुरुवाच साधो मायां मयोद्भाव्य परीक्षितोऽसि । ऋषिप्रभावान्मयि नान्तकोऽपि प्रभुः प्रहर्तुं किमुतान्यहिंस्राः ॥
आश्चर्यचकित उसे गाय ने कहा—हे साधु, मैंने माया रचकर तुम्हारी परीक्षा ली है; ऋषि के प्रभाव से मुझ पर यम भी प्रहार करने में समर्थ नहीं, फिर अन्य हिंसक जीवों की तो बात ही क्या।
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