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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 55
सेयं स्वदेहार्पणनिष्क्रयेण न्याय्या मया मोइचयितुं भवत्तः । न पारणा स्याद्विहता तवैवं भवेदलुप्तश्च मुनेः क्रियार्थः ॥
अतः मैं अपने शरीर को अर्पित कर इसके बदले इसे तुमसे छुड़ाना उचित समझता हूँ, इससे न तुम्हारा भोजन बाधित होगा और न ही मुनि का कार्य नष्ट होगा।
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