अतः मैं अपने शरीर को अर्पित कर इसके बदले इसे तुमसे छुड़ाना उचित समझता हूँ, इससे न तुम्हारा भोजन बाधित होगा और न ही मुनि का कार्य नष्ट होगा।
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