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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 51
एतावदुक्त्वा विरते मृगेन्द्रे प्रतिस्वनेनास्य गुहागतेन । शिलोच्चयोऽपि क्षितिपालमुच्चैः प्रीत्या तमेवार्थमभाषतेव ॥
इतना कहकर जब सिंह शांत हुआ, तब उसकी गुफा में गूँजती प्रतिध्वनि से ऐसा प्रतीत हुआ मानो पर्वत भी प्रसन्न होकर उसी बात को राजा से कह रहा हो।
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