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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 49
अथैकधेनोरपराधचण्डाद्गुरोः कृशानुप्रतिमाद्बिभेषि । शक्योऽस्य मन्युर्भवता विनेतुं गाः कोटिशः स्पर्शयता घटोध्नीः ॥
यदि तुम एक गाय के कारण अग्नि के समान क्रोधित गुरु से भयभीत हो, तो उनके क्रोध को तुम लाखों गायों का दान देकर शांत कर सकते हो।
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