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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 47
एकातपत्रं जगतः प्रभुत्वं नवं वयः कान्तमिदं वपुश्च । अल्पस्य हेतोर्बहु हातुमिच्छन्विचारमूढः प्रतिभासि मे त्वम् ॥
तुम्हारे पास संसार का एकछत्र राज्य, नवयौवन और सुंदर शरीर है, फिर भी थोड़े से कारण के लिए बहुत कुछ त्यागने की इच्छा रखते हुए तुम मुझे विचारहीन प्रतीत होते हो।
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