मान्यः स मे स्थावरजंगमानां सर्गस्थितिप्रत्यवहारहेतुः । गुरोरपीदं धनमाहितग्नेर्नश्यत्पुरस्तादनुपेक्षणीयम् ॥
मेरे लिए वह पूजनीय है जो स्थावर और जंगम सृष्टि के सृजन, पालन और संहार का कारण है, और यह गुरु का धन भी है, इसलिए मेरे सामने इसका नाश उपेक्षणीय नहीं है।
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