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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 43
संरुद्धचेष्टस्य मृगेद्र कामं हास्यं वचस्तद्यदहं विवक्षुः । अन्तर्गतं प्राणभृतां हि वेद सर्वं भवान्भावमतोऽभिधास्ये ॥
हे मृगराज, मेरी रुकी हुई चेष्टा के कारण जो वचन मैं कहना चाहता हूँ वह हास्यास्पद प्रतीत हो सकता है, किन्तु आप प्राणियों के अंतर्मन को जानते हैं, इसलिए मैं कहता हूँ।
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