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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 31
वामेतरस्तस्य करः प्रहर्तुर्नखप्रभाभूषितकङ्कपत्रे । सक्ताङ्गुलिः सायकपुङ्ख एव चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे ॥
प्रहार करने को उठे उसके दूसरे हाथ की उंगलियाँ बाण के पंख पर अटक गईं और वह हाथ नखों की आभा से युक्त कंगन के साथ मानो चित्र में अंकित होकर स्थिर हो गया।
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