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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 30
ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः । जाताभिषङ्गो नृपतिर्निषङ्गादुद्धर्तुमैच्छत्प्रसभोद्धृतारिः ॥
तब शरण देने वाला वह राजा, शत्रुओं का दमन करने वाला, उस सिंह को मारने के लिए अपने तरकश से बाण निकालने को उद्यत हुआ।
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