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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 21
प्रदक्षिणीकृत्य पयस्विनीं तां सुदक्षिणा साक्षतपात्रहस्ता । प्रणम्य चानर्च विशालमस्याः श‍ृङ्गान्तरं द्वारमिवार्थसिद्धेः ॥
सुदक्षिणा ने अक्षत से भरा पात्र हाथ में लेकर उस दुग्धवती गाय की प्रदक्षिणा की, प्रणाम किया और उसके विशाल सींगों के बीच के स्थान को मानो सिद्धि के द्वार के समान पूजित किया।
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