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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 18
आपीनभारोद्वहनप्रयत्नाद्गृष्टिर्गुरुत्वाद्वपुषो नरेन्द्रः । उभावलंचक्रतुरञ्चिताभ्यां तपोवनावृत्तिपथं गताभ्याम् ॥
अपने भारी शरीर के कारण चलते हुए वह राजा और वह धेनु दोनों ही परिश्रम से झुकते हुए तपोवन के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे।
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