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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 13
पृक्तस्तुषारैर्गिरिनिर्झराणमनोकहाकम्पितपुष्पगन्धी । तमातपक्लान्तमनातपत्रमाचारपूतं पवनो निषेवे ॥
पर्वतीय झरनों की शीतल बूँदों से युक्त और वृक्षों से झरते पुष्पों की सुगंध लिए हुए पवित्र वायु, छाया रहित धूप से थके हुए उसे शीतलता प्रदान कर रही थी।
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