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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 12
स कीचकैर्मारुतपूर्णरन्ध्रैः कूजद्भिरापादितवंशकृत्यम् । शुश्राव कुञ्जेषु यशः स्वमुच्चैरुद्गीयमानं वनदेवताभिः ॥
वह बाँसों के छिद्रों में भरी वायु से उत्पन्न मधुर ध्वनि के माध्यम से कुंजों में वनदेवताओं द्वारा गाया जा रहा अपना यश सुन रहा था।
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