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रघुवंशम् • अध्याय 2 • श्लोक 11
धनुर्भृतोऽप्यस्य दयार्द्रभावमाख्यातमन्तःकरणैर्विशङ्कैः । विलोकयन्त्यो वपुरापुरक्ष्णां प्रकामविस्तारफलं हरिण्यः ॥
धनुष धारण करने पर भी उसके करुण हृदय को भाँपकर निर्भय हिरणियाँ उसे निहारती हुई अपनी आँखों को तृप्त कर रही थीं।
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