इन्द्रियार्थपरिशून्यमक्षमः सोढुमेकमपि स क्षणान्तरम् । अन्तरेव विहरन्दिवानिशं न व्यपैक्षत समुत्सुकाः प्रजाः ॥
वह इन्द्रियों के विषयों के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता था और दिन-रात भोग में लिप्त रहता, प्रजा की ओर ध्यान नहीं देता था।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रघुवंशम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रघुवंशम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।