प्रेक्ष्य दर्पणतलस्थमात्मनो राजवेषमतिशक्रशोभिनम् । पिप्रिये न स तथा यथा युवा व्यक्तलक्ष्मपरिभोगमण्डनम् ॥
दर्पण में अपने राजसी रूप को देखकर भी वह उतना प्रसन्न नहीं होता था, जितना भोगों से सुसज्जित यौवन में होता था।
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