चारु नृत्यविगमे स तन्मुखं स्वेदभिन्नतिलकं परिश्रमात् । प्रेमदत्तवदनानिलः पिबन्नत्यजीवदमरालकेश्वरौ ॥
नृत्य के बाद वह प्रियाओं के मुख से निकली वायु को पीते हुए, उनके पसीने से भीगे तिलकयुक्त मुख का आनंद लेता था।
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