स स्वयं प्रहतपुष्करः कृती लोलमाल्यवलयो हरन्मनः । नर्तकीरभिनयातिलङ्घिनीः पार्श्ववर्तिषु गुरुष्वलज्जयत् ॥
वह स्वयं मृदंग बजाते हुए, झूलती मालाओं के साथ, नर्तकियों को अभिनय में पार कर देता और गुरुजनों के सामने भी लज्जित नहीं होता था।
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