व्यूह्यः स्थितः किंचिदिवोत्तरार्धमुन्नद्धचूडोऽञ्चितसव्यजानुः । आकर्णमाकृष्टसबाणधन्वा व्यरोचतास्त्रे स विनीयमानः ॥
सेना में व्यवस्थित खड़े हुए, ऊँची चोटी बाँधे, बाएँ घुटने को झुकाए और कान तक खींचे हुए धनुष के साथ वह अस्त्रविद्या में अत्यंत शोभित होता था।
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