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रघुवंशम् • अध्याय 18 • श्लोक 45
शिरीषपुष्पाधिकसौकुमार्यः खेदं न यायादपि भूषणेन । नितान्तगुर्वीमपि सोऽनुभावाद्धुरं धरित्र्या बिभरांबभूव ॥
शिरीष पुष्प से भी अधिक कोमल होते हुए भी, वह अपने प्रभाव से पृथ्वी का भारी भार सहजता से वहन करता था।
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