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रघुवंशम् • अध्याय 18 • श्लोक 44
निर्वृत्तजाम्बूनदपट्टशोभे न्यस्तं ललाटे तिलकं दधानः । तेनैव शून्यान्यरिसुन्दरीणां मुखानि स स्मेरमुखश्चकार ॥
स्वर्ण पट्ट पर तिलक धारण कर, वह अपनी मुस्कान से शत्रुओं की स्त्रियों के मुख को निस्तेज कर देता था।
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