सर्पस्येव शिरोरत्नं नास्य शक्तित्रयं परः । स चकर्ष परस्मात्तदयस्कान्त इवायसम्॥
जैसे सर्प के मणि को कोई नहीं छीन सकता, वैसे ही उसकी तीनों शक्तियाँ कोई नहीं ले सकता था; बल्कि वह दूसरों की शक्ति को आकर्षित करता था जैसे चुम्बक लोहे को खींचता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रघुवंशम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रघुवंशम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।