इत्थं जनितरागासु प्रकृतिष्वनुवासरम् । अक्षोभ्यः स नवोऽप्यासीद्दृढमूल इव द्रुमः॥
इस प्रकार प्रजा के प्रेम को प्राप्त कर वह नया होते हुए भी दृढ़ मूल वाले वृक्ष की भाँति अचल बना रहा।
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