स धर्मस्थसखः शश्वदर्थिप्रत्यर्थिनां स्वयम् । ददर्श संशयच्छेद्यान्व्यवहारानतन्द्रितः॥
वह सदैव धर्म का मित्र बनकर, स्वयं ही याचकों और प्रतिद्वंद्वियों के मामलों को बिना थके सुलझाता था।
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