स पुरं पुरहूतश्रीः कल्पद्रुमनिभध्वजाम् । क्रममाणश्चकार द्यां नागेनैरावतौजसा॥
इन्द्र के समान वैभव से युक्त वह, कल्पवृक्ष समान ध्वजों वाली नगरी में घूमते हुए, ऐरावत के समान तेज से आकाश को भी मानो भर देता था।
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