स्तूयमानः क्षणे तस्मिन्नलक्ष्यत स बन्दिभिः । प्रवृद्ध इव पर्जन्यः सारङ्गैरभिनन्दितः॥
उस समय स्तुति के बीच वह ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मेघ मयूरों द्वारा अभिनन्दित होकर और अधिक बढ़ गया हो।
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