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रघुवंशम् • अध्याय 17 • श्लोक 14
तस्यौघमहती मूर्ध्नि निपतन्ती व्यरोचत । सशब्दमभिषेकश्रीर्गङ्गेव त्रिपुरद्विषः॥
उसके सिर पर गिरती हुई जलधारा ऐसी शोभित हो रही थी जैसे शिव पर गिरती हुई गंगा की धारा।
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