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रघुवंशम् • अध्याय 16 • श्लोक 87
तस्याः स्पृष्टे मनुजपतिना साहचर्याय हस्ते माङ्गल्योर्णावलयिनि पुरः पावकस्योच्छिखस्य । दिव्यस्तूर्यध्वनिरुदचरद्व्यश्नुवानो दिगन्तान्गन्धोदग्रं तदनु ववृषुः पुष्पमाश्चर्यमेघाः ॥
जब राजा ने विवाह के लिए उसका हाथ अग्नि के सामने ग्रहण किया, तब दिव्य वाद्य गूँज उठे और सुगंधित पुष्पों की वर्षा होने लगी।
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