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रघुवंशम् • अध्याय 16 • श्लोक 64
तीरस्थलीबर्हिभिरुत्कलापैः प्रस्निग्धकेकैरभिनन्द्यमानम् । श्रोत्रेषु संमूर्च्छति रक्तमासां गीतानुगं वारिमृदङ्गवाद्यम् ॥
तट पर नृत्य करते मोरों की मधुर ध्वनि के साथ, स्त्रियों के गीत के अनुरूप जल का मृदंग जैसा नाद कानों में गूँजता है।
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