धूलिकणों से पीली पड़ी अर्जुन वृक्ष की शाखा भी सुंदर लग रही थी, जैसे शिव के क्रोध से जला हुआ कामदेव भले ही नष्ट हुआ हो, पर उसकी आभा बनी रहती है।
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