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रघुवंशम् • अध्याय 16 • श्लोक 44
अगस्त्यचिह्नादयनात्समीपं दिगुत्तरा भास्वति संनिवृत्ते । आनन्दशीतामिव बाष्पवृष्टिं हिमस्रुतिं हैमवतीं ससर्ज ॥
जब सूर्य उत्तरायण से दक्षिण की ओर मुड़ा, तब हिमालय से शीतल जलधारा मानो आनंद के आँसुओं की वर्षा के समान प्रवाहित हुई।
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