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रघुवंशम् • अध्याय 16 • श्लोक 33
तीर्थे तदीये गजसेतुबन्धात्प्रतीपगामुत्तरतोस्य गङ्गाम् । अयत्नबालव्यजनीबभूवुर्हंसा नभोलङ्घनलोलपक्षाः ॥
उसके तीर्थ में, जहाँ हाथियों से सेतु बना था, उत्तर दिशा में उलटी दिशा में बहती गंगा के ऊपर उड़ते हंस ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो बिना प्रयास के पंखे चल रहे हों।
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