उद्यच्छमाना गमनाय पश्चात्पुरो निवेशे पथि च व्रजन्ती । सा यत्र सेना ददृशे नृपस्य तत्रैव सामग्र्यमतिं चकार ॥
चलने के लिए उठती हुई, पीछे और आगे मार्ग में बढ़ती हुई, राजा की सेना जहाँ दिखाई देती थी, वहीं सम्पूर्ण व्यवस्था का केन्द्र बन जाती थी।
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