मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रघुवंशम् • अध्याय 16 • श्लोक 20
रात्रावनाविष्कृतदीपभासः कान्तामुखश्रीवियुता दिवापि । तिरस्क्रियन्ते कृमितन्तुजालैर्विच्छन्नधूमप्रसरा गवाक्षाः ॥
जो खिड़कियाँ रात में दीपों की आभा से प्रकाशित और दिन में सुन्दर मुखों से शोभित होती थीं, वे अब जालों और धुएँ से ढकी हुई उपेक्षित पड़ी हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रघुवंशम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रघुवंशम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें