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रघुवंशम् • अध्याय 16 • श्लोक 17
स्तम्भेषु योषित्प्रतियातनानामुत्क्रान्तवर्णक्रमधूसराणाम् । स्तनोत्तरीयाणि भवन्ति सङ्गान्निर्मोकपट्टाः फणिभिर्विमुक्ताः ॥
जहाँ स्त्रियों के वस्त्र स्तम्भों पर लटकते थे, वहीं अब सर्पों के उतरे हुए केंचुल ऐसे दिखाई देते हैं जैसे धूसर वस्त्र टंगे हों।
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