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रघुवंशम् • अध्याय 15 • श्लोक 83
तत्र नागफणोत्क्षिप्तसिंहासननिषेदुषी । समुद्ररशना साक्षात्प्रादुरासीद्वसुंधरा॥
वहाँ सर्पफणों से उठे हुए सिंहासन पर बैठी हुई, समुद्र को करधनी की तरह धारण करने वाली पृथ्वी देवी स्वयं प्रकट हुई।
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