उभयोर्न तथा लोकः प्रावीण्येन विसिष्मिये । नृपतेः प्रीतिदानेषु वीतस्पृहतया यथा॥
लोग उनके कौशल से उतने चकित नहीं हुए जितना राजा की निष्पृहता से दिए गए उपहारों से हुए।
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