भूयस्तपोव्ययो मा भूद्वाल्मीकेरिति सोऽत्यगात् । मैथिलीतनयोद्गीतनिःस्पन्दमृगमाश्रमम्॥
वाल्मीकि की तपस्या का और नाश न हो, इस विचार से वह उस आश्रम से चला गया जहाँ मैथिली के पुत्रों के गीत से मृग भी निश्चल हो जाते थे।
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