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रघुवंशम् • अध्याय 15 • श्लोक 27
तस्य संस्तूयमानस्य चरितार्थैस्तपस्विभिः । शुशुभे विक्रमोदग्रं व्रीडयावनतं शिरः॥
तपस्वियों द्वारा प्रशंसा किए जाने पर उसका पराक्रम से ऊँचा उठता हुआ सिर लज्जा से झुककर और भी शोभित हो उठा।
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