नातिपर्याप्तमालक्ष्य मत्कुक्षेरद्य भोजनम् । दिष्ट्या त्वमसि मे धात्रा भीतेनेवोपपादितः॥
तुम आज मेरे पेट के लिए पर्याप्त भोजन नहीं हो, फिर भी सौभाग्य से तुम मुझे विधाता द्वारा भेजे गए हो, मानो भयभीत होकर ही मुझे सौंप दिए गए हो।
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