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रघुवंशम् • अध्याय 15 • श्लोक 11
तस्य मार्गवशादेका बभूव वसतिर्यतः । रथस्वनोत्कण्ठमृगे वाल्मीकीये तपोवने॥
उसके मार्ग में एक स्थान पर वाल्मीकि के तपोवन में, जहाँ रथ की ध्वनि सुनकर मृग उत्सुक हो उठते थे, उसकी एक रात्रि निवास हुआ।
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