आदिष्टवर्त्मा मुनिभिः स गच्छंस्तपसां वरः । विरराज रथप्रष्ठैर्वालखिल्यैरिवांशुमान्॥
मुनियों द्वारा बताए मार्ग पर चलता हुआ वह तपस्वियों में श्रेष्ठ, रथ पर स्थित होकर ऐसे शोभित हो रहा था जैसे सूर्य वालखिल्य ऋषियों से घिरा हो।
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