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रघुवंशम् • अध्याय 14 • श्लोक 73
उत्खातलोकत्रयकण्टकेऽपि सत्यप्रतिज्ञेऽप्यविकत्थनेऽपि । त्वां प्रत्यकस्मात्कलुषप्रवृत्तावस्त्येव मन्युर्भरताग्रजे मे॥
यद्यपि वह तीनों लोकों के काँटे को उखाड़ने वाला, सत्यप्रतिज्ञ और विनम्र है, फिर भी तुम्हारे प्रति उसके इस अचानक कलुषित व्यवहार से मुझे भरत के अग्रज पर क्रोध आता है।
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