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रघुवंशम् • अध्याय 14 • श्लोक 68
तथेति तस्याः प्रतिगृह्य वाचं रामानुजे दृष्टिपथं व्यतीते । सा मुक्तकण्ठं व्यसनातिभाराच्चक्रन्द विग्ना कुररीव भूयः॥
उसकी बात को स्वीकार कर राम के अनुज के दृष्टि से ओझल होते ही वह अत्यधिक दुःख के भार से विह्वल होकर कुररी पक्षी की तरह जोर से रोने लगी।
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