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रघुवंशम् • अध्याय 14 • श्लोक 56
सा लुप्तसंज्ञा न विवेद दुःखं प्रत्यागतासुः समतप्यतान्तः । तस्याः सुमित्रात्मजयत्नलब्धो मोहादभूत्कष्टतरः प्रबोधः॥
वह मूर्छित होकर दुःख को न जान सकी, परन्तु चेतना लौटने पर भीतर ही भीतर अत्यन्त व्यथित हुई, और लक्ष्मण के प्रयास से प्राप्त हुआ उसका होश और भी अधिक कष्टदायक बना।
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