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रघुवंशम् • अध्याय 14 • श्लोक 53
अथ व्यवस्थापितवाक्कथंचित्सौमित्रिरन्तर्गतबाष्पकण्ठः । औत्पातिकं मेघ इवाश्मवर्षं महीपतेः शासनमुज्जगार॥
फिर किसी प्रकार अपने वचन को स्थिर करके, भीतर से रुंधे हुए कंठ वाले लक्ष्मण ने मानो प्रलयकारी मेघ की तरह कठोर वचनरूपी वर्षा करते हुए राजा की आज्ञा सुनाई।
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