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रघुवंशम् • अध्याय 14 • श्लोक 49
जुगूह तस्याः पथि लक्ष्मणो यत्सव्येतरेण स्फुरता तदक्ष्णा । आख्यातमस्यै गुरु भावि दुःखमत्यन्तलुप्तप्रियदर्शनेन॥
मार्ग में लक्ष्मण ने अपनी बाईं आँख के फड़कने से उत्पन्न भावी दुःख के संकेत को उससे छिपा लिया, जो प्रिय के दर्शन के अभाव से होने वाला था।
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