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रघुवंशम् • अध्याय 14 • श्लोक 48
सा नीयमाना रुचिरान्प्रदेशान्प्रियंकरो मे प्रिय इत्यनन्दत् । नाबुद्ध कल्पद्रुमतां विहाय जातं तमात्मन्यसिपत्रवृक्षम्॥
सुन्दर प्रदेशों से ले जाई जाती हुई वह यह सोचकर प्रसन्न हो रही थी कि यह मेरे प्रिय का प्रिय कार्य है, वह यह न समझ सकी कि कल्पवृक्ष को छोड़कर वह अपने लिए कष्टदायक वृक्ष की ओर जा रही है।
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