रक्षोवधान्तो न च मे प्रयासो व्यर्थः स वैरप्रतिमोचनाय । अमर्षणः शोणितकाङ्क्षया किं पदा स्पृशन्तं दशति द्विजिह्वः॥
राक्षसों का वध और मेरा परिश्रम व्यर्थ नहीं था, वह तो वैर के प्रतिकार के लिए था; जैसे क्रोधी सर्प केवल रक्त की इच्छा से नहीं, बल्कि पैर से छुए जाने पर ही डँसता है।
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