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रघुवंशम् • अध्याय 14 • श्लोक 32
निर्बन्धपृष्टः स जगाद सर्वं स्तुवन्ति पौराश्चरितं त्वदीयम् । अन्यत्र रक्षोभवनोषितायाः परिग्रहान्मानवदेव देव्याः॥
आग्रहपूर्वक पूछे जाने पर उसने कहा कि नगरवासी आपके चरित्र की प्रशंसा करते हैं, परन्तु उस देवी के विषय में नहीं जो राक्षस के घर में रही थी।
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